

नवरात्रि के पावन पर्व पर गरबा और डांडिया की परंपरा के सामने सवाल—क्या मां दुर्गा की आराधना का मंच फैशन, ग्लैमर और दिखावे की प्रतिस्पर्धा में बदलता जा रहा है?
नवरात्रि मां दुर्गा की उपासना, शक्ति की साधना और श्रद्धा का पर्व है। गरबा और डांडिया केवल नृत्य नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सामूहिक भक्ति की अभिव्यक्ति हैं। लेकिन बदलते दौर में कुछ आयोजनों के स्वरूप को देखकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या अंग-प्रदर्शन की बढ़ती प्रवृत्ति अब भक्ति के सामने एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है?
जब मां की आराधना के लिए सजे मंच पर चर्चा भजनों, आरती और धार्मिक भावना से अधिक परिधानों, फैशन और आकर्षक प्रस्तुतियों की होने लगे, तो उत्सव की मूल भावना पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। आधुनिक परिधान, बैकलेस या डीप-नेक ड्रेस अपने आप में किसी की आस्था का पैमाना नहीं हैं, लेकिन धार्मिक आयोजन में यदि दिखावे की होड़ भक्ति पर हावी होने लगे, तो यह समाज के लिए आत्ममंथन का विषय जरूर है।
सवाल किसी महिला की स्वतंत्रता या उसके कपड़ों का नहीं, बल्कि उस बदलती सोच का है जिसमें मां दुर्गा की आराधना का उत्सव कहीं-कहीं फैशन शो जैसा दिखाई देने लगता है। गरबा की वास्तविक पहचान श्रद्धा, सांस्कृतिक गरिमा, आनंद और सामूहिक सहभागिता में है—न कि किसी के पहनावे को लेकर प्रतिस्पर्धा में।
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आवश्यकता इस बात की है कि गरबा आयोजक धार्मिक भावना और सांस्कृतिक परंपरा को केंद्र में रखें, प्रतिभागियों के सम्मान और स्वतंत्रता का ध्यान रखते हुए आयोजन की गरिमा बनाए रखें। क्योंकि नवरात्रि का संदेश बाहरी चमक से कहीं आगे बढ़कर शक्ति, संयम, सम्मान और सद्भाव की प्रेरणा देता है।
अंग-प्रदर्शन बनाम भक्ति की बहस में सबसे अहम प्रश्न यही है—क्या हम गरबा की आत्मा को बचा पा रहे हैं? मां दुर्गा की आराधना का यह पर्व तभी सार्थक होगा, जब उत्सव की रौनक के साथ श्रद्धा की रोशनी भी उतनी ही प्रखर रहे।
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