Thursday, October 29

19वें सेवा सम्मान में साहित्य का संगम, देशभर के कवियों ने उज्जैन में सजाई काव्य की महफिल


स्व. दुलेसिंह सिकरवार की स्मृति में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में हास्य-व्यंग्य से लेकर वीर रस तक बिखरे रंग; कोटा के गीतकार जगदीश सोलंकी को मिला स्मृति सम्मान 2026

उज्जैन | SDNA

उज्जैन की सांस्कृतिक धरती पर गुरुवार रात कविता, गीत, गजल, हास्य और ओज का ऐसा संगम देखने को मिला, जहां साहित्य केवल मंच पर प्रस्तुत होने वाली रचनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि श्रोताओं के साथ सीधा संवाद करता नजर आया। स्व. दुलेसिंह सिकरवार की स्मृति में आयोजित 19वें सेवा सम्मान एवं अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देश के अलग-अलग शहरों से आए कवियों ने अपनी रचनाओं से देर रात तक सभागार को जीवंत बनाए रखा।

पं. सूर्यनारायण व्यास संकुल, कालिदास संस्कृत अकादमी में आयोजित यह काव्य संध्या रात करीब 8 बजे शुरू हुई। जैसे-जैसे कवियों ने मंच संभाला, सभागार में कभी ठहाके गूंजे तो कभी वीर रस की पंक्तियों ने श्रोताओं में उत्साह भरा। गीत, गजल और शृंगार की प्रस्तुतियों ने वातावरण को भावनात्मक रंग भी दिया।

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जगदीश सोलंकी को स्व. दुलेसिंह सिकरवार स्मृति सम्मान

समारोह का प्रमुख आकर्षण कोटा के सुप्रसिद्ध गीतकार जगदीश सोलंकी को प्रदान किया गया स्व. दुलेसिंह सिकरवार स्मृति सम्मान 2026 रहा। उन्हें सम्मान के साथ अभिनंदन पत्र भी भेंट किया गया।

साहित्य के क्षेत्र में किसी रचनाकार को सम्मानित करना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का अभिनंदन नहीं होता, बल्कि यह उस रचनात्मक परंपरा को भी आगे बढ़ाने का माध्यम बनता है, जिसमें साहित्य समाज की संवेदनाओं, सवालों और अनुभवों को शब्द देता है।

समारोह में अखिल विश्व क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठा. जोगेंद्रसिंह भदौरिया का भी सम्मान किया गया।

हास्य-व्यंग्य ने बांधा समां, वीर रस ने बढ़ाया जोश

कवि सम्मेलन में हास्य-व्यंग्य की प्रस्तुतियां विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। एक कवि ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को भारत में युवाओं के मोबाइल रिचार्ज से जोड़ते हुए ऐसा व्यंग्य प्रस्तुत किया कि सभागार देर तक ठहाकों से गूंजता रहा।

वहीं वीर रस और ओज की कविताओं ने वातावरण में उत्साह और ऊर्जा का संचार किया। गीत और गजल की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को भावनाओं से जोड़ा, जबकि शृंगार रस की रचनाओं ने काव्य संध्या को विविधता प्रदान की।

इस तरह कार्यक्रम में कविता के लगभग हर प्रमुख रंग की मौजूदगी रही—हंसी से लेकर संवेदना तक और मनोरंजन से लेकर सामाजिक चेतना तक।

कई शहरों के कवियों ने साझा किया अपना रचनात्मक संसार

अखिल भारतीय स्वरूप वाले इस आयोजन में विभिन्न शहरों से आए रचनाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। इनमें उज्जैन के सतीश सागर, वाराणसी की विभा सिंह, इटावा के गौरव चौहान, देवास के कुलदीप रंगीला, आगरा की निभा चौधरी, खरगोन के कुमार संभव, गाजियाबाद के मोहित शौर्य और रामगंजमंडी के अर्जुन अल्हड़ सहित अन्य कवि शामिल रहे।

मंच संचालन कवि दिनेश दिग्गज ने किया, जिन्होंने विभिन्न रसों और शैलियों की प्रस्तुतियों के बीच कार्यक्रम को गति प्रदान की।

19 साल की परंपरा, स्मृति से संवाद का माध्यम

स्व. दुलेसिंह सिकरवार की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम अब अपने 19वें वर्ष में पहुंच चुका है। किसी साहित्यिक आयोजन का इतने लंबे समय तक निरंतर बने रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है।

आज के डिजिटल दौर में जब कविता का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया, छोटे वीडियो और त्वरित डिजिटल कंटेंट के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहा है, ऐसे मंचों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रत्यक्ष कवि सम्मेलन श्रोता और रचनाकार के बीच वह संवाद स्थापित करता है, जिसे केवल स्क्रीन पर पढ़ी या सुनी गई कविता हमेशा पूरी तरह नहीं दे पाती।

आयोजन में संस्कृति और सामाजिक क्षेत्र की भागीदारी

कार्यक्रम का आयोजन मध्यप्रदेश संस्कृति संचालनालय एवं स्व. दुलेसिंह सिकरवार स्मृति मंच के तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम के संरक्षक एवं मार्गदर्शक राजेशसिंह कुशवाह तथा संयोजक श्यामसिंह सिकरवार रहे।

समारोह में नगर निगम अध्यक्ष कलावती यादव, सोसायटी फॉर प्रेस क्लब अध्यक्ष नंदू यादव, भाजपा नगर अध्यक्ष संजय अग्रवाल, संपादक राजेंद्र आगाल सहित सामाजिक, राजनीतिक और पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े अनेक लोग उपस्थित रहे।

आयोजन समिति के सदस्यों ने अतिथियों और सम्मानित विभूतियों का स्वागत किया।

खबर के पीछे का अर्थ : साहित्यिक आयोजन से आगे बढ़ती सांस्कृतिक पहचान

इस आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष केवल कवियों की प्रस्तुतियां या सम्मान समारोह नहीं, बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान में साहित्यिक आयोजनों की निरंतरता है।

19 वर्षों से चल रही यह परंपरा यह संकेत देती है कि साहित्यिक मंचों की अपनी स्थायी सामाजिक उपयोगिता है। ऐसे कार्यक्रम वरिष्ठ रचनाकारों को सम्मान देने के साथ-साथ नए कवियों और युवा श्रोताओं के लिए भी मंच तैयार कर सकते हैं।

हास्य-व्यंग्य वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर सहज तरीके से सवाल उठाने का माध्यम बनता है, जबकि वीर रस और ओज सामाजिक ऊर्जा पैदा करते हैं। दूसरी ओर गीत और गजल व्यक्ति की भावनात्मक दुनिया से जुड़ते हैं। इसलिए एक ही मंच पर इन सभी विधाओं की मौजूदगी कार्यक्रम को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहने देती।

आने वाले समय में क्या हो सकता है प्रभाव?

यदि इस प्रकार के आयोजनों को लगातार व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जाता है, तो उज्जैन में अखिल भारतीय साहित्यिक आयोजनों की एक मजबूत पहचान विकसित हो सकती है। देश के अलग-अलग शहरों के कवियों का लगातार जुड़ना स्थानीय साहित्यिक गतिविधियों को राष्ट्रीय मंच से जोड़ने में मदद कर सकता है।

भविष्य में इस परंपरा को युवा कवि मंच, विद्यालय एवं महाविद्यालय स्तर की काव्य प्रतियोगिताओं, साहित्यिक कार्यशालाओं, डिजिटल कविता अभिलेखागार और स्थानीय रचनाकारों के प्रकाशन से जोड़ा जाए तो इसका प्रभाव केवल एक रात के आयोजन तक सीमित नहीं रहेगा।

सबसे बड़ा परिणाम यह हो सकता है कि स्व. दुलेसिंह सिकरवार की स्मृति में शुरू हुआ सम्मान समारोह आने वाली पीढ़ियों के लिए साहित्य, संवाद और सांस्कृतिक निरंतरता का स्थायी मंच बन जाए।

(SDNA)



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