भोजपुरी की बुलंद आवाज, लेकिन भाषा नहीं थी मातृभाषा; कल्पना पटवारी की कहानी में लोकसंगीत से लेकर डकैतों के बीच मंच तक
चार साल की उम्र में शुरू हुआ गायन का सफर, 32 से ज्यादा भाषाओं में गाए गीत; भिखारी ठाकुर की लोक विरासत को भी दी नई पहचान
नई दिल्ली। भोजपुरी संगीत की दुनिया में कल्पना पटवारी एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनकी आवाज में भोजपुरी लोकगीतों की मिठास और लोक संस्कृति की गहरी छाप सुनाई देती है। दिलचस्प बात यह है कि भोजपुरी उनकी मातृभाषा नहीं है। असम में पली-बढ़ीं कल्पना ने अपनी संगीत साधना और भाषा पर मेहनत के दम पर भोजपुरी संगीत में अलग पहचान बनाई।
‘गणेश के पापा’ जैसे लोकप्रिय गीतों से लेकर लोक परंपराओं से जुड़े कई गीतों तक, कल्पना ने भोजपुरी संगीत को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है।
चार साल की उम्र से मंच पर
कल्पना पटवारी का संगीत से रिश्ता बेहद कम उम्र में शुरू हो गया था। उन्होंने करीब चार साल की उम्र में अपने पिता के साथ सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुति देना शुरू किया।
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